About Mahayogi Satyendranath in Hindi

जितना जटिल कौलान्तक पीठ को समझाना है.उससे भी जटिल महायोगी सत्येन्द्र नाथ जी को जानना है..कौलान्तक पीठाधीश्वर बनने से पहले महायोगी जी हिमाचल के धाराखरी नामक गाव में बालक के रूप में पैदा हुए ..3 वर्ष की अवस्था में उनको श्री सिद्ध सिद्धांत नाथ जी महाराज ने सिद्ध परम्परा में दीक्षित किया..जिसका वृत्तांत यहाँ देना मुश्किल है...सात साल की आयु से उनका हिमालय जाना शुरू हुआ..गुरुओं से ज्ञान लेना व कठोर तप की प्रक्रिया से गुजरना आदि...ये बात लोगो से बहुत छुपा कर रखने का प्रयास किया गया..क्योंकि कुल्लू में इस तरह की परम्पराएँ प्रत्यक्ष नहीं हैं...केवल गुप्त है...लोग योगी हो जाने को अच्छा नहीं मानते थे..लेकिन धीरे धीरे लोगो को ये बात पता चल गई.महा गुरु सिद्ध सिद्दांत नाथ जी ने ही महायोगी को 37 अन्य गुरुओं के पास ज्ञान ग्रहण करने के लिए भेजा...महा योगी जी ने योग,ज्योतिष,तंत्र,वास्तु,आयुर्वेद,करमकांड सहित भारतीय बांग्मय का ज्ञान लिया..महा योगी जी की शिक्षा तान्करी लिपि,भूत लिप,देव लिपि और ब्रह्म लिपि में हुई...नृत्य,गायन,सिंगार सहित ...हठ योग...वेद वेदांग में पारंगत हो महायोगी जी 64 कला संपन्न हो गए...महायोगी जी को पूर्व जन्म का ज्ञान दे कर ..महासमाधि में बिठाया गया..महायोगी 12 दिनों तक एक ही आसन पर समाधिस्थ रहे...यक्षिणियों..की सिद्धि महायोगी को जन्मजात थी..जोगिनिओं की कृपा से महा योगी हिमालय के सबसे बड़े योगी बने...कौलान्तक पीठ की अधिष्ठात्री देवी माता तोतला की सिद्धि ने महायोगी को मानवीय सीमायों से परे कर दिया...बंजार नामक जगह के पर्वत लाम्बा लाम्भारी की देवियों ने महायोगी को त्रिकाल ज्ञान दिया...शिकारी (शाकुम्भरी देवी) देवी ने महायोगी को मायावी होने का बरदान दिया...जोगिनी गंधा पर्वत की देवी ने महायोगी को शक्ति छुपा कर मानवीय जीवन जीने को कहा...तभी से महायोगी जी अति मायामय मानवीय जीवन जी रहे है...महायोगी जी को सतयुग का वाहक भी कहा जाता है...राक्षस कुलोद्भूता मायामयी माता हडिम्म्बा ने महायोगी को कहा की वे अपना दुर्लभ ज्ञान कभी भी पूर्णतया प्रत्यक्ष न करे..केवल योग्य साधको एवं धर्मनुयाइयो को ही ये ज्ञान दें...यही कारण है की..बहुत से लोग महायोगी को जानने उनके पास पहुंचे लेकिन उनकी माया को बहुत कम लोग भेद पाए... वे धर्म अध्यात्म की मूल बात न कर साधक को सदा तब तक उलझा कर रखते हैं...जबतक की साधक पर यकीन न हो जाए.योग्य न होने पर महायोगी उसे छोड़ देते हैं..यहाँ महायोगी जी के बारे में केवल इतना बता सकते है की..वे अलौकिक है ...स्वयं महायोगी के अनुसार पूर्व जन्म के एक अधूरे काम को उन्हें पूरा करना है...फिर 38 गुरुओं ने मिलकर उनको कुछ धर्म प्रचार करने को कहा है..लेकिन महायोगी...सामाजिकता नहीं जानते..इसलिए दुनियादारी में उलझ जाते हैं .और खुद पर खूब हँसते हैं.ये उन लोगो का सौभाग्य है जो उनके पास भी रहते हैं..लोग उनके साथ रहते तो हैं पर माया का पर्दा जो माता भ्रामरी ने ड़ाल रख्खा है उन्हें उनसे दूर रखता है..पर शिव और माता के भगतो से महायोगी नहीं छुप पाते वे उनकी माया तोड़ कर उनको पहचान ही लेते हैं...कौलान्तक पीठाधीश्वर के रूप में जबसे वे प्रतिष्ठित हुए है...कौलान्तक पीठ गुप्त रहस्यों के आवरण से निकल आया है...आज विश्व इनके कारण ही कौलान्तक पीठ को जान रहा है..वो दिन दूर नहीं जब हिमाचल का कुल्लू क्षेत्र करोडो लोगो के आकर्षण का केंद्र हो जायेगा...आज ही विश्व के कोने कोने तक ये सन्देश पहुंचना शुरू हो गया है...हिमाचल के साथ साथ भारत के नाम की धर्म पाताका फिर लहरा रही है..शायद यही महायोगी जी का अति संक्षिप्त परिचय है.

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